मनुष्य जीवन सतभक्ति कर परमात्मा प्राप्ति के लिए मिला है।

मनुष्य जीवन सतभक्ति करने व परमात्मा प्राप्ति के लिए मिला है


    यह मानव जीवन परमात्मा प्राप्ति के लिए मिला है। 

यह मानव जीवन अपनें परम पिता परमेश्वर की प्राप्ति के लिए मिला है! क्योंकि यह दुनिया हमारी नहीं है इए तो काल भगवान ज्योतिनिरन्जन की है! जो कि रोज एक लाख शरीर धारी आत्माँओं को तप्तशिला पर भुन कर खाता है व रोज सवा लाख पैदा करता है! यह ब्रह्मा विष्णु शिव इन तीनों का बाप और दुर्गा का पती है! इसनें शपथ ली थी कि अपनें वास्तविक रूप किसीके सामनें नहीं आऊँगा, इसके लिए कोई कितना भी जप तप करे! आश्चर्य करनें वाली बात यह है कि इसका जाप करनें वाला मन्त्र ओम् है! यही कारण था कि ओम् जाप करते करते श्रिषियों नें अपनें शरीर तक गला दिये लेकिन भगवान नहीं मिला, और वो विचारे श्रिषि अपना अनुभव पुराणों में लिखकर चले गये, कि भगवान निराकार है, इसी को पढकर इए दुनिया आज तक बेबकूफ बनी रही और हम अपनें परम पिता परमेश्वर से कोशों दूर हो गये, और यह बात विद् पिरमांणों सहीत मुझे सत् गुरू रामपाल जी महाराज के शरण में जानें के बाद पता चली, और वो पिरमाण गुरू जी नें कुरान शरीफ, बाईबल, अथर्वेद, सामवेद, रिग्वेद, यजुर्वेद, श्रीमद् भगवद् गीता से खोलकर दिखाए, और उन्होंनेें यह सिध्द कर दिया कि सबका मालिक एक है वो कहाँ रहता है कैसे मिलेगा वो भक्तिविधी इस काल की दुनिया से छुटकारा पानें के लिए मानव को दी है, जिससे हम अपनें निज घर सतलोक पहुच सकेगें, जहाँ हमारे तेजपुन्ज के शरीर हैं, जन्म का कष्ट बुढापे का कष्ट बीमारी, लडाई झगड़ा यह सब नहीं है वहाँ पर हम सदा सुखी रहते हैं! यह सब मैनै जो लिखा है इसे पढ़कर आप जी के मन में शंकाएं भी पैदा हुई होगीं, लेकिन इसके लिए आप जी से हाथ जोड़कर विनती है एक बार सत् गुरू रामपाल जी महाराज द्वारा लिखी हुई ज्ञानगंगा पुस्तक पढ़कर अनुसरण जरूर करें, आपकी शंकाओं का समाधान पिरमाणों सहित उसी पस्तक से हो जायेगा! प्लीज आप इए ना देखना कि हमारे गुरूजी जेल में है तो वो गलत है, क्योंकि जो सत्य का मार्ग दिखाता है दुनिया उसके खिलाफ होती है लेकिन जीत हमेसा सत्य की ही होती है, इस बात की गबाही हमारे ही पुरानें इतिहासों में मिलती है, हमारे पूरे शंसार से विनती है कि इस थोड़ी सी बात के पीछे परमात्मां से मूँह न मोड़ो, अगर आपका इए अनमोल मानव जीवन इस काल ने  छीन लिया तो सिवाय पछतानें के अलावा आपके पास कुछ भी नहीं बचेगा!
परमात्मा कहते हैं कि :-
मानुष जन्म दुर्लभ है इए मिले न बारम्बार, जैसे पेड़ से पत्ता टूट गिरै बहूर न लगता डारि!
                           
भगति मार्ग में सतगुरु का होना एक आवश्यक शर्त :-

  

परमात्मा की प्यारी आत्माओं, भक्ति के मार्ग में एक अत्यंत ही जरुरी और महत्वपूर्ण भूमिका होता है "गुरु" का, जिसके बगैर हम इस संसार सागर से कतई पार नहीं हो सकते। जबकि तत्वज्ञान के अभाव में अक्सर लोग कह देते है, भगत और भगवान के बीच में गुरु का क्या काम ? बस यही पर आप मार खा जाते है। गुरु महिमा के विषय में गोस्वामी तुलसी दास जी लिखते हैं:- 

गुरु बिन भव निधि तरई न कोई।जो विरंची शंकर सम होई ।।

अर्थात् बिना गुरु के संसार सागर से कोई पार नहीं हो सकता चाहे वह ब्रम्हा व शंकर के समान ही क्यों न हो।

नानकदेव जी कहते हैं:- 

गुरु की मूरत मन में ध्याना, गुरु के शब्द मंत्र मन माना ।।
मत कोई भरम भूलो संसारी, गुरु बिन कोई न उतरसी पारी ।। 

परमात्मा प्राप्त कर चुकी मीरा बाई ने कहा है:-

पायो जी मैने, राम रतन धन पायो। 
वस्तु अमोलक दी मेरे सतगुरु, करि कृपा अपनायो।। 
पायो जी मैने, राम रतन धन पायो ।। 

कबीर साहेब ने तो यहाँ तक बताया है :- 

राम कृष्ण से कौन बड़ा, उन्हूँ भी गुरु कीन । 
तीन लोक के वे धनी, गुरु आगे आधीन ।।
गुरु बिन माला, फेरते गुरु बिन देते दान। 
गुरु बिन दोनों निष्फल है, चाहे पूछो वेद पुराण ।। 

अर्थात् गुरु के बिना किया गया जाप व दान (भक्ति) सबकुछ व्यर्थ है। इसलिए भक्ति मार्ग में अब हमें बड़ी गहनता से इस विषय को समझना होगा क्योंकि अब के जो हम चूके तो न जाने कब यह नर तन मिले ना मिले। नर तन मिल भी जाए तो सतगुरु मिले ना मिले क्योंकि : गुरु - गुरु में भेद है, गुरु - गुरु में भाव।सोई गुरु नित बंदिये, जो शब्द लखावै दाव ।। अब हमारे सामने बड़ी सबसे बड़ी विडम्बना है कि हम सतगुरु की परख कैसे करें। क्यों कि हमारे यहाँ तो गुरूओं की बाढ़ सी आई हूई है। तो इस समस्या के निदान के लिए नीचे हर स्तर के गुरुओं की महिमा बताई जा रही है। जिनमें से सतगुरु को पहचानकर और उनकी सही स्थिति को जानकर अपना नैया पार लगाना है :-

 प्रथम गुरु है पिता अरु माता, जो है रक्त बीज के दाता। 
दूसर गुरु भई वह दाई, जो गर्भवास की मैल छूड़ाई। 
तीसर गुरु नाम जो धारा, सोइ नाम से जगत पुकारा।
चौंथा गुरु जो शिक्षा दीन्हा, तब संसारी मारग चीन्हा। 
पॉचवा गुरु जो दीक्षा दीन्हा, राम कृष्ण का सुमिरण कीन्हा।। 

 हमारे माता पिता हमारे प्रथम गुरु हैं। जन्म के समय व बाद में जिसने हमारा सम्हाल किया वह हमारा दूसरा गुरु है। जिसने हमारा नामकरण किया वह तीसरा गुरु है हमें शिक्षा देने वाले अध्यापक चौंथे गुरु की श्रेंणी में है। हमें अध्यात्म से जोड़ने वाले पॉचवे गुरु हैं जो हमें परमात्मा प्राप्ति के लिए उपदेश देते हैं।

हमें अध्यात्म कसे जोड़ने वाले गुरु का बहूँत ही महत्वपूर्ण योगदान है क्यों  कि यही वह सीढ़ी है, जहॉ से हम भगवान की ओर प्रथम कदम उठाते हैं और नाना प्रकार के देवी देवताओं (३३करोंड़) को पूजना शुरू करते हैं। नाना प्रकार के व्रत जैसे चतुर्थी, नवमी, एकादशी, अमावस्या, पूर्णिमा आदि व्रतों को करते हूऐ मंदिर, पहाड़, पशु, पक्षी, पेड़, पौधे पूजन के अलावा तीर्थाटन आदि करके खुद को मुक्त मानते हैं।लेकिन उपरोक्त पूजाओं का प्रमाण गीता व् वेदों में न होने से शास्त्रविरुध साधना है।जिस कारण इन पूजाओं का फल गीता जी में व्यर्थ कहा है। (गीता अध्याय .१६ मंत्र २३-२४) इस कारण इन साधनाओं को करके भी शास्त्रविरुद्ध होने से भगति में हम सफल नही हो पाते। आगे छठवॉ गुरु को समझें :-



छठवॉ गुरु भरम सब तोड़ा, "ऊँ" कार से नाता जोंड़ा ।

यह गुरु हमारा भरम निवारण इस आधार पर करता है कि वेद (यजुर्वेद अध्याय.४० मंत्र १५ व १७) और गीता (अध्याय.८ मंत्र १३) में केवल एक "ऊँ" अक्षर ब्रम्ह प्राप्ति (मुक्ति) हेतु बताया गया है। इसके अलावा किसी अन्य देवी देवता की पूजा नही करनी चाहिए। किंतु, इनका यह भक्ति साधना भी पूर्ण लाभदायक नही है। क्योकि गीता ज्ञानदाता (ब्रम्ह) स्वयं गीता में कहता है कि तेरे और मेरे अनेक जन्म हो चुके हैं (प्रमाण- गीताअध्याय.२ मं.१२, अध्याय.४ मं.५ व ९ तथा अध्याय.१० मं.२)। और यह भी स्पष्ट बता दिया कि ब्रम्ह लोक पर्यन्त सब लोक पुनरावृत्ती (उत्पति विनाश) में है (अध्याय.8 म.16) । इसलिए यह गुरू भी पूर्ण नहीं। अब सातवॉ गुरु : सातवॉ सतगुरू शब्द लखाया, जहॉ का जीव तहॉ पहूँचाया । पुन्यात्माओं, इन्हें गुरु नही, अपितु सतगुरु कहा गया है। क्योंकि इनका दिया ज्ञान व भक्ति विधि शास्त्रानुकूल होने से इस लोक और परलोक - दोनो में परम हितकारक है। यह सतगुरु हमें सदभक्ति का दान देकर व हमारा सही ठिकाना बताकर यहॉ काल/ब्रम्ह के २१ ब्रम्हांड से भी और उस पार उस सतलोक को प्राप्त करने की सतसाधना प्रदान करता है जिस मार्ग पर चलने वाला साधक जरा और मरण रुपी महा भयंकर रोग से छुटकारा पाकर उस शास्वत स्थान को प्राप्त करता है, जिस स्थान के बारे में गीता अध्याय.१८ मं.६२ व ६६ में कहा गया है। इसी सतगुरु का संकेत गीता अध्याय.4 के मन्त्र 34 में किया है। और यही सतगुरु ही वह बाखबर है, जिसके बारे में पवित्र कुर्आन शरीफ की सूरत फूर्कानी २५ आयत ५२ से ५९ में भी बताया गया है । अब पुन्यात्माओं, हमें इस सतगुरु/बाखबर की खोज करनी है। दुनिया के सभी संतों, महंतों, गुरुओं को इस पैमाने पर तौलकर देखें तो आपको केवल और केवल एक ही ऐसा संत नजर आएगा जिसके ग्यान का प्रत्युत्तर वर्तमान का कोई भी संत नही दे सका और वह परम संत हैं- "जगतगुरु तत्वदर्शी संत रामपाल जी महाराज हैं ।




◆ बिना गुरु के मोक्ष संभव नही

आखिर क्यूँ कभी सोचा है आपने ? हम मन्दिर जाते, मस्जिद जाते,चर्च जाते फिर भी दु:ख हैं हम सभी देवी-देवताओं को पूजते हैं फिर भी दुखी और घर में क्लेश हम गुरू भी बनाते हैं फिर भी कैंसर, टी.बी., स्वाइन फ्लू, एड्स, कोमा, पथरी, शुगर जैसी आदि खतरनाक बिमारियाँ हमें होती है  हम दान भी देते हैं, जो हमारे बाह्मण-पंडित, काजी-मुल्ला बताते है, वो सब करते हैं-- फिर भी हमारी अकाल मौत और गरीबी से तंग, रोजी-रोटी को परेशान हमने व्रत किये, रोजे किये, तीर्थ किये, मक्का-मदीना किये फिर भी हमारी आँखों के सामने बाप से पहले बेटे-बेटी की अकाल मृत्यु, पत्नी से पहले पति की मृत्यु, दुर्घटना में पूरा परिवार ही खत्म।




Note:- कभी सोचा है:- क्यों होता है ऐसा....आखिर क्यों ?  आप जानना चाहते हैं, इन सभी सवालों के जबाव...और जीवन की इन सभी समस्याओं से छुटकारा..अर्थात् मोक्ष तो अवश्य देखिये....साधना चैनल शाम 07.40 से 08.40 तक संत रामपाल जी महाराज के अमृत प्रवचन.
- संत जी के प्रवचन रोजाना जरूर देखे, क्यूँकि पहली बार देखने से जो शंकाएँ आपके मन में उठेंगी, उन सभी शंकाओं का समाधान प्रवचन रोजाना देखने पर ही होगा।


दोस्तों आज हम 21वीं सदी में जी रहे हैं आज आप शिक्षित हैं और आज आपको कोई मूर्ख नहीं बना सकता इसलिए दोस्तों स्वयं परखने की ज़रूरत है क्या सही है और क्या गलत बेहतर यही होगा और हमारा निष्पक्ष भाव होना चाहिए दोस्तों पहली बात तो बिना गुरु के भक्ति हो ही नहीं सकती और दूसरी बात इस धरती पर 100 गुरु में से 99 तो नकली, झूठे, और पाखंडी है क्योंकि इन सब का ज्ञान हमने शास्त्रों के मापदंड से मापकर देखा है और आप भी देखना चाहे देख सकते हैं निष्पक्ष भाव से, दोस्तों इस धरती पर कोई पूर्ण संत है तो वह संत रामपाल जी महाराज हैं क्योंकि उनकी बताई गई साधना शास्त्रविधि अनुसार है और 100% authentic और लाभकारी भी, बाकी सारे धर्म गुरुओं की साधना शास्त्रविरुद्ध है मित्रों यहां आपको स्वयं परखने की जरूरत है क्योंकि आज तक हम दूसरे के बहकावे में आकर मूर्ख बनते रहे। 
           श्रीमद्भागवत गीता अध्याय 16 श्लोक 23 में गीता ज्ञान दाता ने कहा है, हे अर्जुन जो पुरुष शास्त्रविधि को त्याग कर मनमाना आचरण करता है मनमानी पूजाऐं करता है उसको ना सुख न तो सिद्धि और ना ही परम गति ही प्राप्त होती है इसलिए हे अर्जुन कर्तव्य और आकर्तव्य की व्यवस्था में शास्त्र ही प्रमाण है |



और अधिक जानकारी के लिए पढ़े पवित्र पुस्तक "ज्ञान गंगा" अभी Download करें!  


DOWNLOAD PDF




Post a Comment

Previous Post Next Post